apathit gadyansh mcq class 9 10
अपठित गद्यांश
1. निम्नलिखित गदयांशों तथा इन पर आधारित प्रश्नोत्तरों को ध्यानपूर्वक पढ़िए-
भारती धर्मनीति के प्रणेता नैतिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक थे। उनकी यह धारणा थी कि नैतिक मूल्यों का दृढ़ता से पालन किए बिना किसी भी समाज की आर्थिक व सामाजिक प्रगति की नीतियाँ प्रभावी नहीं हो सकतीं। उन्होंने उच्चकोटि की जीवन-प्रणाली के निर्माण के लिए वेद की एक ऋचा के आधार पर कहा कि उत्कृष्ट जीवन-प्रणाली मनुष्य की विवेक-बुद्ध से तभी निर्मित होनी संभव है, जब सब लोगों के संकल्प, निश्चय, अभिप्राय समान हों, सबके हृदय में समानता की भव्य भावना जाग्रत हो और सब लोग पारस्परिक सहयोग से मनोनुकूलकार्य करें। चरित्र-निर्माण की जो दिशा नीतिकारों ने निर्धारित की, वह आज भी अपने मूल रूप में मानव के लिए कल्याणकारी है। प्रायः यह देखा जाता है कि चरित्र और नैतिक मूल्यों की उपेक्षा वाणी, बाहु और उदर को संबत न रखने के कारण होती है। जो व्यक्ति इन तीनों पर नियंत्रण रखने में सफल हो जाता है, उसका चरित्र ऊँचा होता है।
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सभ्यता का विकास आदर्श चरित्र से ही संभव है। जिस समाज में चरित्रवान व्यक्तियों का बाहुल्य है, वह समाज सभ्य होता है और वही उन्नत कहा जाता है। चरित्र मानव-समुदाय की अमूल्य निधि है। इसके अभाव में व्यक्ति पशुवत व्यवहार करने लगता है। आहार, निद्रा, भय आदि की वृत्ति सभी जीवों में विद्यमान रहती है. यह आचार अर्थात चरित्र की ही विशेषता है, जो मनुष्य को पशु से अलग कर, उससे ऊँचा उठा मनुष्यत्व प्रदान करती है। सामाजिक अनुशासन बनाए रखने के लिए भी चरित्र-निर्माण की आवश्यकता है। सामाजिक अनुशासन की भावना व्यक्ति में तभी जाग्रत होती है, जब वह मानव प्राणियों में ही नहीं वरन सभी जीवधारियों में अपनी आत्मा के दर्शन करता है।
प्रश्न-
(क) हमारे धर्मनीतिकार नैतिक मूल्यों के प्रति विशेष जागरूक क्यों थे?
(ख) चरित्र मानव-जीवन की अमूल्य निधि कैसे है? स्पष्ट कीजिए।
(ग) धर्मनीतिकारों ने उच्चकोटि की जीवन प्रणाली के संबंध में क्या कहा?
(घ) प्रस्तुत गद्यांश में किन पर नियंत्रण रखने की बात कही गई है और क्यों?
(ड) कैसा समाज सभ्य और उन्नत कहा जाता है?
(च) सामाजिक अनुशासन की भावना व्यक्ति में कब जाग्रत होती है?
(छ) उत्कृष्ट और प्रगति शब्दों के विलोम तथा बाहु और वाणी' शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
(ज) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
2.वैदिक युग भारत का प्राय: सबसे अधिक स्वाभाविक काल था। यही कारण है कि आज तक भारत का मन उस काल की ओर बार-बार लोभ से देखता है। वैदिक आर्य अपने युग को स्वर्णकाल कहते थे या नहीं, यह हम नहीं जानते किंतु उनका समय हमें स्वर्णकाल के समान अवश्य दिखाई देता है। लेकिन जब बौद्ध युग का आरंभ हुआ, वैदिक समाज की पोल खुलने लगी और चिंतकों के बीच उसकी आलोचना आरंभ हो गई। बौद्ध युग अनेक दृष्टियों से आज के आधुनिक आदोलन के समान था। ब्राहमणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध बुद्ध ने विद्रोह का प्रचार किया था, बुद्ध जाति प्रथा के विरोधी थे और वे मनुष्य को जन्मना नहीं कर्मणा श्रेष्ठ या अधम मानते थे।
नारियों को भिक्षुणी होने का अधिकार देकर उन्होंने यह बताया था कि मोक्ष केवल पुरुषों के ही निमित्त नहीं है, उसकी अधिकारिणी नारियाँ भी हो सकती हैं। बुद्ध की ये सारी बातें भारत को याद रही हैं और बुद्ध के समय से बराबर इस देश में ऐसे लोग उत्पन्न होते रहे हैं. जो जाति- प्रधा के विरोधी थे, जो मनुष्य को जन्मना नहीं, कर्मणा श्रेष्ठ या अधम समझते थे। किंतु बुद्ध में आधुनिकता से बेमेल बात यह थी कि वे निवृत्तिवादी थे, गृहस्थी के कर्म से वे भिक्षु-धर्म को श्रेष्ठ समझते थे। उनकी प्रेरणा से देश के हजारों-लाखों युवक, जउन बाक समाजक भण- पण कनेके हायक थे सन्यास होगए संन्यासक संस्था समाज विधिी सस्था हैं।
प्रश्न -
(क) वैदिक युग स्वर्णकाल के समान क्यों प्रतीत होता है?
(ख) जाति-प्रथा एवं नारियों के विषय में बुद्ध के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
(ग) बुद्ध पर क्या आरोप लगता है और उनकी कौन-सी बात आधुनिकता के प्रसंग में ठीक नहीं बैठती?
(घ) संन्यास का अर्थ स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि इससे समाज को क्या हानि पहुँचती है।
(ड) बौद्ध युग का उदय वैदिक समाज के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए किस प्रकार हानिकारक था?
(च) बौद्ध धर्म ने नारियों को समता का अधिकार दिलाने में किस प्रकार से योगदान दिया?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए-
1.उपसर्ग और मूल शब्द अलग-अलग करके लिखिए विद्रोह, संन्यास।
2.मूल शब्द और प्रत्यय अलग-अलग करके लिखिए आधुनिकता, विरोधी।
3. तत्ववेत्ता शिक्षाविदों के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है। प्रथम वह, जो हमें जीवन-यापन के लिए अर्जन करना सिखाती है और द्रवितीय वह, जो हमें जीना सिखाती है। इनमें से एक का भी अभाव जीवन को निरर्थक बना देता है। बिना कमाए जीवन-निर्वाह संभव नहीं। कोई भी नहीं चाहेगा कि वह परावलंबी हो-माता-पिता, परिवार के किसी सदस्य, जाति या समाज पर। पहली विद्या से विहीन व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है, वह दूसरों के लिए भार बन जाता है। साथ ही विद्या के बिना सार्थक जीवन नहीं जिया जा सकता। बहुत अर्जित कर लेनेवाले व्यक्ति का जीवन यदि सुचारु रूप से नहीं चल रहा, उसमें यदि वह जीवन-शक्ति नहीं है, जो उसके अपने जीवन को तो सत्यपथ पर अग्रसर करती ही है, साथ ही वह अपने समाज, जाति एवं राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन करती है, तो उसका जीवन भी मानव जीवन का अभिधान नहीं पा सकता। वह भारवाही गर्दभ बन जाता है या पूँछ सींगविहीन पशु कहा जाता है।
3.वर्तमान भारत में दूसरी विद्या का प्राय. अभावे दिखाई देता है, परंतु पहली विद्या का रूप भी विकृत ही है, क्योंकि न तो स्कूल कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करके निकला छात्र जीविकार्जन के योग्य बन पाता है और न ही वह उन संस्कारों से युक्त हो पाता है, जिनसे व्यक्ति कु से सु बनता है, सुशिक्षित, सुसभ्य और सुसंस्कृत कहलाने का अधिकारी होता है। वर्तमान शिक्षा-पद्धति के अंतर्गत हम जो विद्या प्राप्त कर रहे हैं, उसकी विशेषताओं को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता। यह शिक्षा कुछ सीमा तक हमारे दृष्टिकोण को विकसित भी करती है. हमारी मनीषा को प्रबुद्ध बनाती है तथा भावनाओं को चेतन करती है, किंतु कला, शिल्प, प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा नाममात्र की होने के फलस्वरूप इस देश के स्नातक के लिए जीविकार्जन टेढ़ी खीर बन जाता है और बृहस्पति बना युवक नौकरी की तलाश में अर्जियाँ लिखने में ही अपने जीवन का बहुमूल्य समय बर्बाद कर लेता है।
जीवन के सर्वागीण विकास को ध्यान में रखते हुए यदि शिक्षा के क्रमिक सोपानों पर विचार किया जाए, तो भारतीय विद्यार्थी को सर्वप्रथम इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए. जो आवश्यक हो, दूसरी जो उपयोगी हो और तीसरी जो हमारे जीवन को परिष्कृत एवं अलंकृत करती हो। ये तीनों सीढ़ियाँ एक के बाद एक आती हैं, इनमें व्यतिक्रम नहीं होना चाहिए। इस क्रम में व्याघात आ जाने से मानव-जीवन का चारु प्रासाद खड़ा करना असंभव है। यह तो भवन की छत बनाकर नींव बनाने के सदृश है। वर्तमान भारत में शिक्षा की अवस्था देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने अन्न से आनंद की ओर बढ़ने को जो विद्या का सार कहा था, वह सर्वथा समीचीन ही था।
प्रश्न-
(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) व्यक्ति किस परिस्थिति में मानव-जीवन की उपाधि नहीं पा सकता?
(ग) विद्या के कौन-से दो रूप बताए गए हैं?
(घ) वर्तमान शिक्षा पद्धति के लाभ व हानि बताइए।
(ड) विद्याहीन व्यक्ति की समाज में क्या दशा होती है?
(च) शिक्षा के क्रमिक सोपान कौन-कौन-से हैं?
(छ) शिक्षित युवकों को अपना बहुमूल्य समाज क्यों बर्बाद करना पड़ता है?
4. प्रजातंत्र के तीन मुख्य अंग है कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका। प्रजातंत्र की सार्थकता एवं दृढ़ता को ध्यान में रखते हुए और जनता के प्रहरी होने की भूमिका को देखते हुए मीडिया (दृश्य, श्रव्य और मुद्रित) को प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाता है। समाचार-माध्यम या मीडिया को पिछले वर्षों में पत्रकारों और समाचार-पत्रों ने एक विश्वसनीयता प्रदान की है और इसी कारण विश्व में मीडिया एक अलग शक्ति के रूप में उभरा है।
कार्यपालिका और विधायिका की समस्याओं, कार्य-प्रणाली और विसंगतियों की चर्चा प्रायः होती रहती है और सर्वसाधारण में वे विशेष चर्चा के विषय रहते ही हैं। इसमें समाचार पत्र, रेडियो और टी०वी० समाचार अपनी टिप्पणी के कारण चर्चा को आगे बढ़ाने में योगदान करते हैं, पर न्यायपालिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उसके बारे में चर्चा कम ही होती है। ऐसा केवल अपने देश में ही नहीं, अन्य देशों में भी कमोबेश यही स्थिति है।
स्वराज-प्राप्ति के बाद और एक लिखित संविधान के देश में लागू होने के उपरांत लोकतंत्र के तीनों अंगों के कर्तव्यों, अधिकारों और दायित्वों के बारे में जनता में जागरूकता बढ़ी है। संविधान निर्माताओं का उद्देश्य रहा है कि तीनों अंग परस्पर ताल मेल से कार्य करेंगे। तीनों के पारस्परिक संबंध भी संविधान द्वारा निर्धारित , फिर भी समय के साथ साथ कुछ समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। आज लोकतंत्र यह महसूस करता है कि न्यायपालिका | भी अधिक पारदर्शिता हो, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़े। जिस देश में पंचों को परमेश्वर मानने की परंपरा, वहाँ न्यायमूर्तियों पर आक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण है।'
प्रश्न-
(क) लोकतंत्र के तीनों अंगों का नामोल्लेख कीजिए। चौथा अंग किसे माना जाता है?
(ख) लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
(ग) अत्यंत महत्वपूर्ण अंग होने के बावजूद न्यायपालिका के बारे में मीडिया में कम चर्चा क्यों होती है?
(घ) जनता में अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में किसका योगदान है? कैसे?
(ड) पारदर्शिता' से क्या तात्पर्य है? लोकतंत्र न्यायपालिका में अधिक पारदर्शिता क्यों चाहता है?
(च) आशय स्पष्ट कीजिए जिस देश में पंचों को परमेश्वर मानने की परंपरा हो, वहाँ न्यायमूर्तियों पर आक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण है।'
5.संस्कृतियों के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्रायः सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक समान रहते हैं, किंतु बाहय उपादानों में अंतर अवश्य आता है। राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा से संपृक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की संपदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलन के अवसर अति सुलभ हो गए हैं, संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति संशयालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है।
अपनी संस्कृति को छोड़, विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुंच रही है, वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं है। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अतः आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किंतु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलंबन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोकप्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनशक्ति मिले, किंतु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है।
प्रश्न-
(क) आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारंभ होने का प्रमुख कारण बताइए।
(ख) हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु क्यों हो गए हैं?
(ग) राष्ट्रीय संस्कृति की हमारे प्रति सबसे बड़ी देन क्या है?
(प) हम अपनी सांस्कृतिक संपदा की उपेक्षा क्यों नहीं कर सकते?
(ड) हम विदेशी संस्कृति से क्या ग्रहण कर सकते हैं तथा क्यों?
6. परियोजना शिक्षा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। इसे तैयार करने में किसी खेल की तरह का ही आनंद मिलता है। इस तरह परियोजना तैयार करने का अर्थ है-खेल-खेल में बहुत कुछ सीख जाना। यदि आपको कहा जाए कि दशहरा पर निबंध लिखिए, तो आपको शायद उतना आनंद नहीं आएगा। लेकिन यदि आपसे कहा जाए कि अखबारों में प्राप्त जानकारियों के अलावा भी आपको देश-दुनिया की बहुत सारी जानकारियाँ प्रदान करती है। यह आपको तथ्यों को जुटाने तथा उन पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। इससे आप में नए-नए तथ्यों के कौशल का विकास होता है। इससे आपमें एकाग्रता का विकास होता है। लेखन संबंधी नई-नई शैलियों का विकास होता है।
आपमें चिंतन करने तथा किसी पूर्व घटना से वर्तमान घटना को जोड़कर देखने की शक्ति का विकास होता है। परियोजना कई प्रकार से तैयार की जा सकती है। हर व्यक्ति इसे अलग ढंग से, अपने तरीके से तैयार कर सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे हर व्यक्ति का बातचीत करने का, रहने का, खाने-पीने का अपना अलग तरीका होता है। ऐसा निबंध, कहानी कविता लिखते या चित्र बनाते समय भी होता है। लेकिन ऊपर कही गई बातों के आधार पर यहाँ हम परियोजना को मोटे तोर पर दो भागों में बाँट सकते हैं-एक तो वे परियोजनाएँ, जो समस्याओं के निदान के लिए तैयार की जाती हैं और दूसरी , जो किसी विषय की समुचित जानकारी प्रदान करने के लिए तैयार की जाती है।
समस्याओं के निदान के लिए तैयार की जाने वाली परियोजनाओं में संबंधित समस्या से जुड़े सभी तथ्यों पर प्रकाश डाला जाता है और उस समस्या के निदान के लिए भी दिए जाते हैं। इस तरह की परियोजनाएँ प्रायः सरकार अथवा संगठनों द्वारा किसी समस्या पर कार्य - योजना तैयार करते समय बनाई जाती हैं। इससे उस समस्या के विभिन्न पहलुओं पर कार्य करने में आसानी हो जाती है। किंतु दूसरे प्रकार की परियोजना को आप आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसे 'शैक्षिक परियोजना' भी कहा जाता है। इस तरह की परियोजनाएँ तैयार करते समय आप संबंधित विषय पर तो को जुटाते हुए बहुत सारी नई-नई बातों से अपने-आप परिचित भी होते हैं।
(क) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) परियोजना क्या है? इसका क्या महत्व है?
(ग) शैक्षिक परियोजना क्या है?
(घ) परियोजना हमें क्या-क्या प्रदान करती है?
(ड) परियोजना किस प्रकार तैयार की जा सकती है? यह कितने प्रकार की होती है?
(च) समस्या का निदान करने वाली परियोजना केसी होनी चाहिए?
(छ) फोटो-फीचर परियोजना से आप क्या समझते हैं?
7.सफलता चाहने वाले मनुष्य का प्रथम कर्त्तव्य यह देखना है कि उसकी रुचि किन कार्यों की ओर अधिक है। यह बात गलत है कि हर कोई मनुष्य हर एक काम कर सकता है। लार्ड वेस्टरफील्ड स्वाभाविक प्रवृत्तियों के काम को अनावश्यक समझते थे और केवल परिश्रम को ही सफलता का आधार मानते थे। इसी सिद्धांत के अनुसार उन्होंने अपने बेटे स्टेनहोप को जो सुस्त ढीला-ढाला, असावधान था, सत्पुरुष बनाने का प्रयास किया। वर्षों परिश्रम करने के बाद भी लड़का ज्यों का त्यों रहा और जीवन-भर योग्य न बन सका। स्वाभाविक प्रवृत्तियों को जानना कठिन भी नहीं है। बचपन के कामों को देखकर बताया जा सकता है कि बच्चा किस प्रकार का मनुष्य होगा। प्रायः यह संभावना प्रबल होती है कि छोटी आयु में कविता करने वाला कवि, सेना बनाकर चलने सेनापति, भुट्टे चुराने वाला चोर-डाकू,पुर्जे कसने वाला मैकेनिक और विज्ञान में रुचि रखने वाला वैज्ञानिक बनेगा।जब यह बात विदित हो जाए कि बच्चे की रुचि किस काम की ओर है, तब यह करना चाहिए कि उसे उसी विषय की ऊँची शिक्षा दिलाई जाए। ऊँची शिक्षा प्राप्त करके मनुष्य अपने काम- धंधे में कम परिश्रम से अधिक सफल हो सकता है। जिनके काम-धंधे का पूर्ण प्रतिबिंब बचपन में नहीं दिखता, अपवाद ही हैं । प्रत्येक मनुष्य में एक विशेष कार्य को अच्छी तरह करने की शक्ति होती है। वह बड़ी दृढ़ और उत्कृष्ट होती है। वह देर तक नहीं छिपती। उसी के अनुकूल व्यवसाय चुनने से ही सफलता मिलती है। जीवन में यदि आपने सही कार्यक्षेत्र चुन लिया तो समझ लीजिए कि बहुत बड़ा काम कर लिया।
(1) लार्ड वेस्टरफील्ड का क्या सिद्धांत था ?
(i) परिश्रम ही सफलता का आधार है| (ii) कविता करने वाला कवि होगा
(iii) मनुष्य एक काम कर सकता है (iv) सेना बनाकर चलने वाला सेनापति होता है
(ख) स्टेनहोप के विषय में कौन सी बात सही नहीं है ?
(i) वह सुस्त ढीला-ढाला, असावधान था
(ii) वह बड़ा होकर सत्पुरुष बन गया।
(iii) वह जीवन-भर योग्य न बना।
(iv) पिता ने अपने सिद्धांत का स्टेनहोप पर परीक्षण किया।
(ग) बालक आगे चलकर कैसा मनुष्य बनेगा इसका अनुमान कैसे लगाया जा सकता है?
(i) उसके बचपन के कार्यों को (ii) उसकी चाल को देखकर
(iii) उसकी बातों को सुनकर (iv) उसके पढ़ने को देखकर
(घ) सही कार्यक्षेत्र चुनने के क्या लाभ हैं ?
(i) मनुष्य को अपने कार्यों में सफलता मिलती है
(ii) मनुष्य अपने कार्यों में सफल नहीं होता
(iii) मनुष्य अपने व्यवसाय को चुन लेता है
(iv) सभी विकल्प सही हैं।
(ङ) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढिए। तत्पश्चात नीचे दिए विकल्पों में से उचित विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए।
कथन(A) : सफ़लता चाहने वाले मनुष्य को अपनी रुचि के कार्यों में उच्च शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
कारण (R):उच्च शिक्षा प्राप्त कर कोई भी व्यक्ति किसी भी कार्यक्षेत्र में सफ़ल हो सकता है।
कथन (A) सही है , कारण (R) गलत है।
कथन (A) गलत है , कारण (R) सही है।
कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं किंतु कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
कथन (A) (R) और कारण (A) (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
8.नागरिक के कर्त्तव्य और अधिकारों की समष्टि को नागरिकता कहा जाता है। नागरिकता ऐसी विशेषता है, जिसके अभाव में मनुष्य न तो समाज का आवश्यक अंग बन पाता है और न राज्य का। इसके बिना मनुष्य का जीवन एक प्रकार से या तो पशुवत् हो जाता है या महान् विरागी सन्यासी के समान, जिसका सांसारिकता से कोई संबंध नहीं होता। अतः नागरिकता हर मनुष्य को नागरिक बनाने के लिए आवश्यक है। सदाचार का अर्थ है-सत् + आचार = सात्विक व्यवहार। किंतु साधारण अर्थ में इसका प्रयोग उन सभी व्यवहारों और कार्यों के लिए होता है जो समाज द्वारा हो और अच्छे सामाजिक क्रियाओं को नियंत्रित करता रहता है। इसकी आवश्यकता होती है. समाज को व्यवस्थित तथा स्पंदित रखने के लिए। झूठ न बोलना, चोरी न करना, किसी को अनावश्यक ढंग से न सताना आदि सदाचार माने जाते हैं। इन सब कार्यों का त्याग इसलिए आवश्यक होता है कि इनसे समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होती है तथा समाज का ढाँचा लड़खड़ा जाता है। समाज उन्हीं गुणों का आदर-सम्मान करता है जो सामाजिक विधियों को दृढ़ बनाने में तथा बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय कार्यों में सहायक होते हैं।
(1)गद्यांश में ‘सांसारिकता से क्या अभिप्राय है?
(i) सांसारिक जीवन से विरक्ति का भाव
(ii) सांसारिक भोग-विलास के साधन
(iii) सांसारिक कर्त्तव्यों और अधिकारों का निर्वहन
(iv) सांसारिक जीवन से माया-मोह
(2) समाज द्वारा मनुष्य की दैनिक और सामाजिक क्रियाओं को नियंत्रित क्यों किया जाता है?
(i) नागरिकों को कर्तव्य पालन सिखाने के लिए
(ii)समाज को व्यवस्थित और मर्यादित करने के लिए
(iii) सांसारिक जीवन से मोह भंग न होने के लिए
(iv) अनाचार को बढ़ावा देने के लिये
(3)गद्यांश के अनुसार निम्नलिखित में से किसे सदाचार माना जाता है ?
(i)झूठ न बोलना
(ii)चोरी न करना
(iii)किसी को अनावश्यक रूप से न सताना
(iv) ये सभी
(4) नागरिकता का अर्थ है-
(i) अनाचार को बढ़ावा
(ii) कर्तव्य और अधिकारों का समूह
(iii सामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण
(iv) सिर्फ़ अधिकारों की अपेक्षा
(5) निम्नलिखित कथन (A) और कारण (B) को ध्यानपूर्वक पढ़िए। फिर नीचे दिए गए विकल्पों में से कोई एक सही विकल्प चुनकर लिखिए-
कथन (A) सदाचार समाज को व्यवस्थित तथा स्पंदित रखने के लिए आवश्यक है
कारण (R) सदाचार द्वारा बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय कार्यों में सहायता होती हैं।
कथन (A) सही है लेकिन कारण (R) गलत है।
कथन (A) गलत है। लेकिन कारण (R) सही है
कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या है
कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं है|
9.लोभ और अहंकार किसलिए जबकि एक दिन सब कुछ यहीं छोड़कर जाना है। लोभ का कोई अंत नहीं। जब सिकंदर जैसे लोग साथ नहीं ले जा पाए तो इतनी धन 3. दिए गए प्रश्नों संपदा की लालसा करने से क्या लाभ। यह एक अंधी दौड़ है, जिसमें आप कितना भी आगे निकल जाएँ, फिर भी किसी से आप पीछे रहेंगे ही और अंत में सभी कुछ यहीं छोड़कर चले जाएँगे। इसलिए ज्ञानी संत कह गए हैं। कि हमें अपनी आवश्यकताओं और कामनाओं को सीमित करना चाहिए, क्योंकि वे अंतहीन हैं और आप उसके भँवर में फँसकर अपनी सुख-शांति सब खो देंगे। यदि व्यक्ति परिग्रह-रहित जीवन यापन करें, यदि वह यह मानकर चलें कि उसका कुछ नहीं है, यह तो ईश्वर की देन है और वह इसका एक अभिरक्षक या सरंक्षक है, तो वह खोने-पाने के तनाव से मुक्ति पा सकता है। गीता में कहा गया है- मैं कौन हूँ, मैं क्या लाया था, मैं क्या ले जाऊँगा। यदि हम अपने जीवन को तनावरहित और खुशहाल बनाना चाहते हैं तो हमें व्यर्थ की धन-वैभव की लालसा और लोभ छोड़कर जीवन को ईश्वर की अमानत समझकर, ईश्वर का आशीर्वाद समझकर दूसरों की भलाई करते हुए एक संरक्षक की तरह कर्त्तव्य का निर्वाह करते हुए जीवनयापन करना होगा।
(क) धन-संपदा की लालसा करने से क्यों मना किया गया है?
(i) मृत्यु के बाद सब यहीं छूट जाना है।
(ii) धन संपदा का जीवन में कोई महत्त्व नहीं होता है।
(iii) इससे जीवन में सुख-शांति आती है।
(iv) सिकंदर अपने साथ कुछ नहीं ले जा पाया था।
(ख) जीवन को तनावरहित और खुशहाल रखने के लिए क्या करना चाहिए?
(i) धन-वैभव की लालसा का त्याग (ii) दूसरों की भलाई करते जीवन यापन
(iii) ईश्वर की भक्ति करना (iv) ये सभी
(ग) हमें अपनी आवश्यकताओं और कामनाओं को सीमित करने को कहा गया है क्योंकि-
(i) हम अधिक धन -संपत्ति एकत्र नहीं कर सकते।
(ii) यह ज्ञानी- संतों की सलाह है।
(iii) कामनाएँ अंतहीन हैं और उनके भँवर में फ़ँसकर हम सुख-शांति सब खो देंगे।
(iv) गीता में कहा गया है- मैं कौन हूँ, मैं क्या लाया था, मैं क्या ले जाऊँगा।
(घ) लेख के अनुसार जीवन में कर्तव्य का निर्वाह कैसे करना चाहिए?
(i) स्वयं को अधिकारी मानकर स्वामी की तरह ।
(ii) जीवन को ईश्वर की देन मानते हुए संरक्षक की तरह।
(iii) बहुत सारी धन-संपत्ति एकत्र करके।
(iv) अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करके।
(ङ) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढिए। तत्पश्चात नीचे दिए विकल्पों में से उचित विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए।
कथन(A) : हमें अपनी आवश्यकताओं और कामनाओं को सीमित करना चाहिए।
कारण (R): लालच एक अंधी दौड़ है, जिसमें आप कितना भी आगे निकल जाएँ, फिर भी किसी से आप पीछे रहेंगे ही और अंत में सभी कुछ यहीं छोड़कर चले जाएँगे।
कथन (A) सही है , कारण (R) गलत है।
कथन (A) गलत है , कारण (R) सही है।
कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं किंतु कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता।
कथन (A) (R) और कारण (A) (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
10.समय बहुत मूल्यावान होता है। यह बीत जाए तो लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके भी इसे वापस नहीं लाया जा सकता। इस संसार में जिसने भी समय की कद्र की है, उसने सुख के साथ जीवन गुजारा है और जिसने समय की बर्बादी की, वह खुद ही बर्बाद हो गया है। समय का मूल्य उस खिलाड़ी से पूछिए, जो सेकंड के सौवे हिस्से से पदक चूक गया हो। स्टेशन पर खड़ी रेलगाड़ी एक मिनट के विलंब से छूट जाती है। आजकल तो कई विद्यालयों में देरी से आने पर विद्यालय में प्रवेश भी नहीं करने दिया जाता। छात्रों को तो समय का मूल्य और भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए, क्योंकि इस जीवन की कद्र करके वे अपने जीवन के लक्ष्य को पा सकते हैं।
(क) उपरोक्त गद्यांश में कीमती किसे माना गया है?
(i) जीवन को
(ii) अनुशासन को
(iii) समय को
(iv) खेल को
(ख) किसने सुख के साथ जीवन गुजारा
(i) जिसने दुनिया में खूब धन कमाया
(ii) जिसने मीठी बाणी बोली
(iii) जिसने समय की कद्र की
(iv) जिसने समय को बर्बाद किया
ग) सेकंड के सौवें हिस्से से पदक कौन चूक जाता है
(i) खिलाड़ी जिसने मामूली अंतर से पदक गंवा दिया हो
(ii) वह यात्री जिसकी ट्रेन छूट गई
(iii) उपर्युक्त दोनों लोग
(iv) इनमें कोई नहीं
(घ) छात्रों को समय की कद्र करने से क्या लाभ होता है?
(i) वे स्वस्थ हो जाते हैं।
(ii) वे मेधावी बन जाते हैं।
(iii) वे सभी विषयों में 100% अंक प्राप्त करते हैं।
(iv) वे लोकप्रिय हो जाते हैं।
(ङ) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक होगा
(i) समय का मूल्य
(ii) जीवन का लक्ष्य
(iii) विद्यार्थी जीवन में समय का महत्त्व
(iv) अनुशासन
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